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जलियांवाला बाग हत्याकांड के 101 वर्ष पूर्ण

शाम के 4 बज रहे थे,

लोग शांति से इकट्ठा हो रहे थे, लोगों में गांधी जी, सत्यपाल मलिक और डॉक्टर सैफ़ुद्दीन को अंग्रेजी सरकार द्वारा रॉलेट एक्ट के विरोध के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था, उसके प्रति रोष था। लेकिन सब शान्ति से सत्य और अहिंसा के पुजारी गाँधी जी के कहे मार्गों पर चलते हुए, जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण ढंग से निःशस्त्र इकट्ठा हो रहे थे। ये सभा किसने बुलाई किसी को पता नही थी, बस सब अपने-अपने घरों से परिवार सहित आ रहे थें।
13 अप्रैल 1919 वैशाखी का पर्व था, यह अति आनंददायी त्यौहार होता है, सब एकजुट होकर बड़े प्रेम से मनाते है, गेहूं की कटाई शुरू हो जाती है, अन्न भण्डार से घर भरने लगता है, सब खुशियां मनाते है। लेकिन किसको पता था, की क्या होने वाला है। सब भाईचारे के साथ शांति पूर्ण ढंग से बधाई देते हुए, खुशियां मनाते हुए, झूमते-गाते हुए, स्त्रियाँ-बच्चें, नौजवान, बूढ़े, सब अति आनंद में मग्न थें।


रॉलेट एक्ट एक ऐसा एक्ट था, जो देश के आजादी के लिए लड़ रहे क्रांतिकारियों के लिए लाया गया। इसे “न वकील न दलील और न अपील” वाला कानून था, इस एक्ट से क्रांतिकारियों को बिना वारंट के गिरफ्तार कर लिया जाता था, और उन पर बिना मुकदमा चलाये जेल भेजा जा सकता था। गाँधी जी द्वारा इसी का विरोध करने के लिए 30 मार्च को पूरे देश में सभाएं करने और शांतिपूर्ण रूप से जुलूस निकालने का आह्वान किया गया, लेकिन इसको किसी कारण वश बदल का 06 अप्रैल कर दिया गया। इस दिन पूरे देश में एक साथ हड़ताल किया गया।
इसी एक्ट के विरोध करने के लिए गाँधी जी अपने साथियों के साथ मुम्बई से पंजाब जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही उन्हें गिरफ्तार कर अहमदाबाद भेज दिया गया।
यह समाचार बिजली की तरह फैल गया, इसीलिए जलियांवाला बाग में इसके विरुद्ध एक शांति सम्मेलन का आयोजन किया गया था।
जनरल ड्वायर ने सुबह 9 बजे ही इस सभा की अवैधानिक करार दे दिया, लेकिन किसी को इससे फर्क नही पड़ने वाला था, लोग जहाँ-तहाँ से आ रहे थे।


बाग जनसैलाब से भरा था, बिल्कुल मधुमक्खी के छत्ते के तरीक़े से, बाग में जाने का केवल एक रास्ता था, बाकी चारों तरफ दीवाल घिरा था।
अभी वक्तव्य शुरू ही हुआ था, की शाम 05 बजकर 10 मिनट पर जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ द्वार पर आ खड़ा हुआ, और एक साथ गोली चलाने का आदेश दे दिया, और तब तक गोली चलाई गयी, जब तक गोलियां खत्म नही हो गयी।
यह मानवता-सभ्यता का सबसे क्रूर दिन था, और इस दिन सारी सभ्यताओं की हदें पार कर दी गयी।
देखते-देखते वहां लाशों का ढेर लग गया, वहां से भागने का कोई रास्ता भी नही था, वहां पर एक कुआँ था, उसी में लोग एक-एक करके कुदनें लगे, और कई लोग उसमे दबकर ही मर गए।
1650 राउंड गोलियां खत्म होने में केवल 6 मिनट ही लगे, और हजारों लोग शहीद हो गए।
इस कुकृति से देश में आक्रोश व्याप्त हो गया, और 1857 जैसी उपजी क्रांति एक बार फिर उग्र हो गयी। इसी हत्याकांड से प्रेरित होकर शाहिद भगत सिंह, उधम सिंह जैसे वीर क्रांतिकारी जन्म लिये।
उधम सिंह उस समय वही बाग में थे, और सबको पानी पिला रहे थे, इस हत्याकांड को देखकर उन्होंने जनरल ड्वायर को मारने की शपथ ली, और 13 मार्च 1940 में लन्दन के कैक्सन हॉल में जनरल ओ ड्वायर की गोली मार कर हत्या कर दी, ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई और वो हँसते-हँसते शहिद हो गए।
जलियांवाला बाग हत्याकांड को देखकर उस समय के साहित्य के एक मात्र नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने अपने “नाईट” की उपाधि त्याग दी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्वाध्यक्ष सर शंकरन नायर ने वायसराय के कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा दे दिया।
मिस्टर थॉमसन और गैट्सन ने कहा की अमृतसर दुर्घटना भारत सरकार में युगांतर कालीन दुर्घटना थी, जैसा की 1857 के विद्रोह की घटना थी।
इस घटना में हजारों लोग मारें गए 3 हजार लोग घायल हुए, किंतु सरकारी रिपोर्ट में केवल 379 लोगों की मृत्यु एवं 1200 लोगों को घायल बताया गया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड में एक ड्वायर ने दूसरे ड्वायर का साथ दिया और हजारों निर्दोष, निसहाय, निशस्त्र लोगों की हत्या कर दी।
सदियों बाद ब्रिटिश सरकार ने इस पर शर्मिंदगी जताई, लेकिन माफी अभी तक नही मांगी।
इस हत्याकांड से गांधी जी के साथ पूरा देश बहुत क्षुब्ध हुआ।
13 अप्रैल 1919 को हुए इस हत्याकांड ने एक अंग्रेजी शासन का एक क्रूर इतिहास रच दिया, जिसे देश कभी नही भूलेगा।
देश के शहीदों को अश्रुपूर्ण नमन, और श्रद्धांजलि।
🙏🙏
मुकेश श्रीवास्तव राज्य लेखक (उत्तर प्रदेश)
कैरियर मार्ग दर्शक (cmdnews.in)

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