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संपादकीय: धारा 370 के साथ 35A का अंत

धारा 370 के साथ 35A एक ऐसा अनुच्छेद था जिसके जरिये जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ था। यूँ कहे तो उसको इतना विशेष दर्जा मिला था कि वो भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह व्यवहार करता था। उसका अलग ध्वजा था, अलग संविधान था, यहाँ तक कि अगर केंद्र सरकार कोई भी विधेयक पास करती थी तो धारा 370 और 35A के कारण उस पर वो विधेयक तब तक लागू नही होता था जब तक कि वहाँ की विधायिका पास न कर दे। और यह शक्ति उसे ऐसे ही नही मिली थी, इसके पीछे लंबी कहानी है।
स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 में ऐसे प्रावधान थे जिससे-


1- भारत और पाकिस्तान दो अलग राष्ट्र होंगे।
2- जो प्रांत जिस भी राष्ट्र में मिलना चाहता है, मिल सकता है।
3- जो भी प्रांत स्वतंत्र रहना चाहता है, वह रह सकता है, इत्यादि।
भारत जब स्वतंत्र हुआ, तो पंजाब और बंगाल के दो भाग कर दिए गए, पूर्वी और पश्चिमी। पश्चिमी पंजाब जिसमे लाहौर आता है और पूर्वी बंगाल पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। प्रांत समुदाय के हिसाब से बांटा गया था, और इस तरह पाकिस्तान को स्वतंत्रता 14 अगस्त 1947 को मिल जाती है, और भारत को 15 अगस्त 1947 को।
बंटवारे के वक्त सरदार बल्लभ भाई पटेल को सभी प्रांतों को भारत मे विलय की जिम्मेदारी मिली थी, अधिकतर प्रांत को विलय कर लिया गया था लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर भारत मे नही विलय होना चाहते थे। सरदार पटेल ने हैदराबाद के निजाम को धमकी देकर विलय करवा लिया और जूनागढ़ का राजा सरदार पटेल के डर से भाग गया। लेकिन जम्मू और कश्मीर का मामला पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू ने अपने पास रख लिया था। अगर इसे भी सरदार पटेल के हाथ मे दे दिया गया होता तो वो भी भारत मे विलय कर लिया जाता, लेकिन खैर……
जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह स्वतंत्र होने के इच्छुक थे, और इसीलिए उन्होंने भारत मे विलय होने के प्रपत्र पर हस्ताक्षर नही किये। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को अपने मे विलय करना चाहता था, और इस डर से की कही वह भारत मे न मिल जाये 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। इस भय से की कही पाकिस्तान कश्मीर को हथिया न ले, राजा हरिसिंह ने भारत से मदद मांगी। भारत मदद देने को तैयार हो गया लेकिन उसने यह शर्त रखी कि, जम्मू-कश्मीर में रक्षा,ध्वज, विदेश नीति,मुद्रा भारत की होगी, राजा हरिसिंह ने स्वीकार किया और 27 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षर कर दिए।
अब भारतीय सैनिक जम्मू-कश्मीर में उतर गयी और पाकिस्तानी सैनिक भाग निकले, लेकिन तब तक यह मुद्दा यू0इन0वो में उठा दिया गया, और वहाँ से आदेश आया कि जो सैनिक जहाँ है वही रुक जायें। और इसी से जो सैनिक जहाँ थे वही के बीचों बीच से एक रेखा एल0वो0सी (line of control) खींच दी गयी, जहाँ आज भी दोनो राष्ट्रों में उसे लेकर विवाद बना हुआ है।
अब बात करते है धारा 370 और 35A की, शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ नेता थे और राजा हरिसिंह के समय मे वहाँ के प्रधानमंत्री भी रहे थे , पंडित जवाहरलाल नेहरु के मित्र थे। उन्होंने नेहरू जी से संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए कुछ अनुच्छेद डलवाने की बात कही। नेहरूजी ने बाबा भीमराव अंबेडकर से बात की तो भीमराव अंबेडकर ने साफ शब्दों में यह कहते हुए मना कर दिया कि मैं संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष होने के नाते ऐसा कोई भी काम नही कर सकता, इससे भारत की अखण्डता और एकता पर भविष्य में खतरा उत्पन्न हो जाएगा। एक ही सुर में सारे संविधान सभा के सदस्यों ने इसे मना कर दिया, यहाँ तक कि सरदार पटेल ने भी। लेकिन जब नेहरू विदेश में थे तो वहाँ से उन्होंने सरदार पटेल को पत्र लिख कर विशेष दर्जे के सम्बंध में जोर देकर बात की। सरदार जो इस विशेष दर्जे के विरोधी थे वो नेहरू की बात का मान रखते हुए संविधान सभा में यह बात रखी, सरदार पटेल के बातों को कोई मना नही कर पाया और यह अनुच्छेद 370 के रूप में संविधान में उल्लेखित कर दिया गया।
तब सरदार पटेल ने कहा कि “जवाहरलाल रोयेगा”। 17 अक्टूबर 1949 को जम्मू कश्मीर पर अनुच्छेद 370, को लागू कर दी गया, इससे वह राज्य अपना संविधान खुद तैयार कर सकता था।
जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच आजादी के 5 साल बाद जुलाई 1952 में दिल्ली में एक बैठक हुई जो कश्मीर की स्वायत्तता को परिभाषित करने के लिए की गई थी। 1954 में 35A भी जम्मू कश्मीर में लागू कर उसे और स्वायत्तता प्रदान कर दी गयी, यह दिन भारत मे एक काला दिन की तरह आया जिससे जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा होते हुए भी यह भारत से अलग हो गया, और स्वतंत्र व्यवहार करने लगा। वहाँ पर सारे नियम-कानून वहाँ की विधायिका बनाती थी, जम्मू-कश्मीर केवल नाम का भारत का हिस्सा रह गया था। वहाँ पर तिरेंगे के समानांतर वहाँ का ध्वज लगाया जाता था। वहाँ का विधानसभा 6 वर्ष का होता था।
धारा 35A के तहत वहाँ के नागरिकों को दोहरी नागरिकता मिलती थी, एक भारत की एक जम्मू-कश्मीर की। वहाँ की युवती अगर भारत के किसी युवक से शादी कर लेती तो वहाँ पर उसकी नागरिकता रद्द हो जाती, वही पर अगर वह किसी पाकिस्तानी व्यक्ति से शादी कर लेती तो उसे भी जम्मू कश्मीर की नागरिकता मिल जाती थी। भारत का कोई भी व्यक्ति वहाँ पर जमीन नही खरीद सकता था, न वहाँ की कोई राज्य सरकार की नौकरी कर सकता था।
इसके चलते भारत के नागरिक को वहाँ पर विदेशी बना दिया गया था। इस धारा को हटाने के लिए वर्षो से संघर्ष चल रहा था। तब जाकर 05 अगस्त 2019 को इस अनुच्छेद को हटाया जा सका।
लेकिन इस धारा को हटाना इतना आसान भी न था, बहुत होशियारी से इसकी तैयारी की गई जिससे लोगो को कानों-कान खबर न चली। विवाद न होने पाए इसके लिए जम्मू-कश्मीर में सैनिकों की कई कम्पनी वहाँ भेज दी गयी, फिर सबसे पहले इसे राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया क्योकि वहाँ पर बहुमत की कमीं थी, और अगर पहले इसे लोकसभा में पेश किया जाता तो बवाल बढ़ जाता और शायद यह पारित न हो पाता। राज्यसभा में पास होने के बाद इसे लोकसभा में पेश किया गया और वहाँ भी पारित हो गया, फिर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इस धारा को हटा दिया गया, और जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बांट दिया गया, एक भाग लद्दाख़ और दूसरा जम्मू-कश्मीर, दोनो को केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। लद्दाख़ को पूर्ण केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा और जम्मू कश्मीर को दिल्ली के समान दर्जा दिया गया, वहाँ पर विधानसभा रहेगा। इसके चलते अब भारत मे 28 राज्य और 9 केंद्रशासित प्रदेश हो गए।
यह दिन भारत मे वैसे ही मनाया गया, जैसा पहली स्वतंत्रता के दिन मनाया गया था,ऐसा लग रहा था मानो जैसे आज ही भारत को आजादी मिली हो।
लेकिन भारत को अभी और मुक्ति की जरूरत है वह है, गंदगी से मुक्ति, चाहे वह देश के अंदर की हो चाहे बाहर की।
यही सोच के साथ अपने शब्दों को विराम देना चाहता हूँ, धन्यवाद।।
मुकेश श्रीवास्तव

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