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सोशलमीडिया पर स्टेटस डालने के समय ही उनके प्रति प्यार आता है:FATHER DAY

फ़ादर्स दे
आज 16 जून है, लोग इसे फ़ादर्स डे के रूप में मना रहे है, यानी कि पिता का दिन। इस व्यस्तता पूर्ण जीवन में जहाँ लोगो को अपने लिए एक पल का समय नही मिलता इसलिए कुछ लोगो ने अपने चिरपरिचित से मिलने के लिए, समय निकलने के लिए कुछ दिन निकाल दिए, इसी दिन विशेष में लोग खुशियां मनाते है, बाहर टहलने जाते है।
वहीं कुछ लोग ऐसे भी है जिनके हृदय में केवल सोशलमीडिया पर स्टेटस डालने के समय ही उनके प्रति प्यार आता है , बाद वहीं व्यक्ति उनसे दिल से बात भी नही करता, और न ही उनके प्रति कोई प्रेम और सम्मान की भावनाएं रहती है।
जब कोई व्यक्ति एक पिता बनता है, तो उस पर खुशियों के साथ जिम्मेदारियों का बोझ भी आ जाता है। इसमें कोई शक भी नही है कि वह उस जिम्मेदारियों को भलीभांति निभाता भी है, और इसने कोई कमी न रह जाये इसके लिए वो दिन-रात अथक परिश्रम करता है। उसके इस परिश्रम का उसका पुत्र कोई मोल नही दे सकता।
अधिकतर लोग अपनी माँ को अधिक सम्मान देते है, उनसे ज्यादा प्यार करते है। रामचरित मानस के अयोध्या कांड में तुलसीदास ने लिखा भी है कि।

जो केवल पितु आयसु ताता।

तौ जनि जाहु जनि बडि. माता।।

इसमे भी कोई दो राय नही है, की माँ के चरणों मे स्वर्ग होता है। लेकिन इससे भी हम मुकर नही सकते कि पिता उस स्वर्ग का दरवाजा होता है।
अतः हम यह नही कह सकते कि केवल माता ही सब कुछ है या केवल पिता ही सब कुछ है।
सच कहें तो माता-पिता जीवन रूपी रथ के दो पहिये है, एक भी पहिया अगर साथ न दे तो दूसरा पहिया अकेले नही चल सकता। इसलिए मनुष्य की उत्पत्ति में इन दोनों का अहम योगदान है, हमे दोनो की अतिआवश्यकता है।
वेदों में भी माता-पिता का अति का गुणगान है। पृथ्वी पर अवतरित ईश्वर ने भी इनको ही सर्वप्रथम पूज्य माना है। और कहा भी गया है,

“सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।

मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्।।”

अर्थात- सब तीर्थ में माता और सब देवो में पिता है और इन्ही को सबसे पहले पूजना चाहिए।
भगवान गणेश ने भी अपने माता-पिता को सर्वमान्यता दिया है, जब कार्तिकेय और गणेश भगवान में पूरा ब्रम्हांड की परिक्रमा करने की बात हुई तो कार्तिकेय ने अपने वाहन मयूर पर बैठ कर पूरे ब्रम्हांड की परिक्रमा करने चल दिये थे, लेकिन वहीं गणेश भगवान ने अपने माता-पिता को एक स्थान पर बैठा कर उनकी परिक्रमा कर ली और उन्हें ही सर्व देवो में प्रथम पूज्य का स्थान मिल गया था।
जहाँ भगवान ने भी माता-पिता की महिमा गाते नही थकते, वहीं आज का व्यक्ति अपने ईश्वर रूपी माता-पिता को किसी भी प्रकार का ताड़ना देने से नही चुकता। क्या यही हमारी सभ्यता है? क्या हम वही भूमि पर रहते है जहाँ श्रवण कुमार जैसे महापुरुष ने जन्म लिया जिनके कर्म की गाथा कौन नही जानता।
आज का व्यक्ति अपनी व्यस्तता भरे समय मे अपने माता-पिता के लिए एक पल भी नही निकाल पाते जबकि उसी माता-पिता ने उस बच्चे के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जो पिता हमे अनाथालय में नही जाने देता, उसे हम वृद्धाश्रम में डाल देते है। उनके प्रेम का हम यही परिणाम देते है।
इस पूरे विश्व मे खुद के माता-पिता ही होते है, जो अपने पुत्र को स्वयं से ऊंचा बढ़ता देख सकते है।
जब बच्चा बड़ा हो जाता है, कुछ करने के लायक हो जाता है, तो वो खुद के माता-पिता को इतना तवज्जो नही देता है, जबकि उनके न रहने पर वह बहुत पछताता है, क्योकि उसके सिर से भगवान का हाथ उठा जाता है और उसे इसका एहसास बाद में होता है। फिर वही कहावत रह जाती है “अब पछताए होत का, जब चिड़िया चुग गयी खेत”
अतः हमे समय रहते उनकी उपस्थित को समझना चाहिए, उन्हें समझना चाहिए, उनके हर एक बात को समझना चाहिए। क्योकि वो हमारा कभी अहित नही सोच सकते। और जब हम खुद पिता बनते है, तो उनकी याद आती है, और सोचते है कि हम उन्हें नही समझ सके। और फिर हम अपने बच्चे से उम्मीद रखते है कि वो हमें समझे, लेकिन क्या हम बबूल की पेड़ लगा कर, आम खाने की उम्मीद रख सकते है।
एक दिन उनके नाम का दिन बना कर हम उनके उम्मीदों पर खरा नही उतर सकते, वो हमसे हमेशा हमारा थोड़ा सा वक्त मांगते है क्या हम उन्हें इतना भी नही दे सकते। वो हमसे सोना, चांदी, हीरा-मोती नही मांगते । बस उन्हें थोड़ी सी इज्जत और थोड़ा सा समय चाहिये। ये हमे समय रहते समझ लेना चाहिए। 

संसार के समस्त माता-पिता के चरणों मे समर्पित

लेखक- मुकेश श्रीवास्तव

विवेक कुमार श्रीवास्तव संपादक

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